नगर पालिक निगम दुर्ग की सबसे महत्वपूर्ण कुर्सी पिछले लगभग एक महीने से खाली पड़ी है। आयुक्त नहीं होने का सीधा असर अब निगम के कामकाज पर दिखाई देने लगा है। शहर के विकास कार्य, भुगतान, प्रशासनिक निर्णय और कई महत्वपूर्ण फाइलें लंबित बताई जा रही हैं। इसका खामियाजा जनता, जनप्रतिनिधि, अधिकारी-कर्मचारी और ठेकेदार सभी को भुगतना पड़ रहा है।
सूत्रों के अनुसार वर्तमान में कार्यवाहक आयुक्त मोहेन्द्र कुमार साहू के पास जिम्मेदारी है, लेकिन निगम में चर्चा है कि वे कई महत्वपूर्ण फाइलों पर हस्ताक्षर करने से बच रहे हैं। परिणामस्वरूप अनेक मामलों में निर्णय लंबित हैं और कार्यालय में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
आखिर हस्ताक्षर से परहेज़ क्यों?
निगम के गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या प्रशासनिक निर्णय लेने में किसी प्रकार का भय है?कुछ अधिकारी-कर्मचारी, नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर, यह चर्चा करते हैं कि पूर्व में एक सफाई कर्मचारी की आत्महत्या के मामले में श्री साहू पर आरोप लगाए गए थे। हालांकि इस मामले में क्या आधिकारिक निष्कर्ष निकला, यह स्पष्ट नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या उसी कारण संवेदनशील फाइलों पर निर्णय लेने में अतिरिक्त सावधानी बरती जा रही है, या इसके पीछे कोई और वजह है? इस संबंध में कार्यवाहक आयुक्त का पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
जनता के काम अटके, विकास की रफ्तार धीमी
निगम से जुड़े लोगों का कहना है कि भुगतान, निर्माण कार्यों की स्वीकृति, विभिन्न प्रस्ताव और कई प्रशासनिक प्रक्रियाएं प्रभावित हो रही हैं। जनप्रतिनिधियों का भी कहना है कि समय पर निर्णय नहीं होने से आम नागरिकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल…
जब एक महीने से नगर निगम बिना नियमित आयुक्त के चल रहा है, तो आखिर राज्य शासन नया आयुक्त कब नियुक्त करेगा?क्या दुर्ग नगर निगम को जल्द निर्णय लेने वाला नियमित नेतृत्व मिलेगा, या ‘खाली कुर्सी’ का संकट आगे भी जारी रहेगा?
