दुर्ग। एक तरफ प्रदेश के मुख्यमंत्री सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर सख्ती की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दुर्ग जिले के खपरी, कुटेला भाटा, गनियारी और रसमड़ा क्षेत्र में सरकारी जमीन का मुरूम और मलमा दिन-रात खोदा जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह पूरा खेल किसके संरक्षण में चल रहा है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिना खनिज विभाग की अनुमति के भारी मशीनों से सरकारी जमीन को खोखला किया जा रहा है। मुरूम से भरे हाईवा और ट्रैक्टर खुलेआम सड़कों पर दौड़ रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग की आंखों पर जैसे पट्टी बंधी हुई है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर कोई आम आदमी एक ट्रॉली मिट्टी भी निकाल ले तो तुरंत कार्रवाई हो जाती है, लेकिन यहां पूरे पहाड़ और सरकारी जमीन गायब हो रही है और प्रशासन मौन साधे बैठा है।
सुशासन तिहार के दौरान सरकार जनता की समस्याएं सुनने का दावा कर रही है, लेकिन इन्हीं दिनों अवैध खनन का यह खेल प्रशासनिक दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। आखिर खनिज विभाग की टीम को यह सब दिखाई क्यों नहीं दे रहा? क्या विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतने बड़े स्तर पर अवैध उत्खनन संभव है?
ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि लगातार शिकायतों के बावजूद न तो खनिज विभाग कोई ठोस कार्रवाई कर रहा है और न ही जिला प्रशासन इस पर सख्ती दिखा रहा है।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि अवैध खनन से सरकारी राजस्व को लाखों का नुकसान हो रहा है, वहीं पर्यावरण और गांव की सड़कों की हालत भी खराब होती जा रही है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या दुर्ग जिले में अवैध खनन माफियाओं के सामने प्रशासन पूरी तरह बेबस हो चुका है? या फिर ‘सब सेट है’ के फॉर्मूले पर पूरा खेल चल रहा है?
फिलहाल जनता की निगाहें जिला प्रशासन और खनिज विभाग पर टिकी हैं कि आखिर कब इन अवैध खनन माफियाओं पर कार्रवाई होगी, या फिर सुशासन तिहार के बीच यह खेल यूं ही चलता रहेगा।
