
स्मार्ट पुलिसिंग का ढिंढोरा पीटने वाले विभाग की खोखली हकीकत को इस सनसनीखेज वारदात ने पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। जब पूरा शहर दिनभर की थकान के बाद रात नौ बजे अपने परिवार के साथ खाने की मेज पर बैठा सुकून के पल बिता रहा था, ठीक उसी वक्त कुंदरा पारा जैसे घने रिहायशी इलाके में कानून व्यवस्था को सरेआम सूली पर चढ़ा दिया गया। एक शख्स को सड़क पर दौड़ा-दौड़ाकर बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया और खाकी का खौफ कहीं नजर नहीं आया। हालांकि मरने वाले का अपना एक आपराधिक इतिहास रहा है, लेकिन खौफनाक पहलू यह है कि जब दो गुटों के बीच सड़क पर खून की होली खेली जा रही थी, तब लोग घरों से बाहर तमाशबीन बनकर तो निकले, पर किसी एक में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि पुलिस को फोन घुमा दे। यह डर बेवजह नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की नाकामी का जीता-जागता सबूत है जहां आम जनता को भरोसा ही नहीं है कि उनकी पहचान गुप्त रहेगी। लोगों को अच्छे से मालूम है कि अगर पुलिस को सूचना दी और बात लीक हुई, तो अगली लाश उनकी भी हो सकती है। लेकिन स्मार्ट पुलिसिंग की फजीहत का असली तमाशा तो इसके बाद शुरू हुआ। इस खूनी संघर्ष में घायल हुए आरोपी जिला अस्पताल पहुंचता है, वहां अपना इलाज कराता है और बेहद आसानी से पुलिस की नाक के नीचे से रफूचक्कर हो जाता है। कानून के रखवाले और खुद को जांबाज कहने वाले पुलिस अधिकारी हाथ पर हाथ धरे तमाशा देखते रह गए और आरोपी फरार हो गया। जो महकमा खुद को हाईटेक और स्मार्ट कहता नहीं थकता, उसकी इस लाचारी ने यह साफ कर दिया है कि सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं, जबकि जमीन पर अपराधियों का राज चल रहा है।
