दुर्ग में क्राइम ब्रांच की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल! छोटे मामलों में सख्ती तो रसूखदारों पर नरमी?

शहर में नशा, जुआ और सट्टा जैसे अवैध कारोबार पर लगाम लगाने के लिए क्राइम ब्रांच लगातार कार्रवाई कर रही है, लेकिन इन कार्रवाइयों की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। हाल ही में सामने आए मामलो ने पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में ला खड़ा किया है।

जानकारी के अनुसार, दुर्ग के एक थाना क्षेत्र में क्राइम ब्रांच ने एक युवक को मादक पदार्थ के साथ गिरफ्तार किया। आरोप है कि युवक के पास मात्र 5 ग्राम नशीला पदार्थ था, लेकिन कार्रवाई के दौरान उसे बढ़ाकर करीब 2 किलो की जप्ती दिखा दी गई। इस मामले के सामने आने के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या कुछ मामलों में आंकड़े बढ़ाने के लिए कार्रवाई को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।

वहीं दूसरी ओर, शहर में यह बात भी किसी से छुपी नहीं है कि सट्टा कारोबार में बड़े स्तर पर लाखों रुपए का लेन-देन जारी है, जिसमें कथित तौर पर कुछ रसूखदार लोगों की संलिप्तता बताई जाती है।

हाल ही में इसी थाना क्षेत्र में एक प्रभावशाली व्यक्ति के ठिकाने पर क्राइम ब्रांच की टीम ने दबिश दी थी, लेकिन बताया जा रहा है कि राजनीतिक पहुंच और विशेष संगठनों के प्रभाव के चलते उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।

हरनाबांधा कांड की याद फिर ताज़ा — जब जनता ने थाना घेरा, फिर भी नहीं हुई कोई ठोस कार्रवाई!


पूर्व में भी क्राइम ब्रांच की कार्यवाही को लेकर हरनाबांधा क्षेत्र में लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आया था। आक्रोशित लोगो ने थाना का घेराव तक कर दिया था और कार्रवाई की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई थी। बावजूद इसके, मामले में आज तक किसी भी अधिकारी या टीम पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पीड़ित पक्ष द्वारा दिए गए आवेदन अब भी जांच के नाम पर लंबित हैं, जिससे सवाल और गहरे होते जा रहे हैं कि आखिर जवाबदेही तय क्यों नहीं हो पा रही है।

इन घटनाओं के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या कानून सभी के लिए समान रूप से लागू हो रहा है, या फिर गरीब और कमजोर लोगों पर सख्ती और प्रभावशाली लोगों पर नरमी बरती जा रही है?

गौरतलब है कि सरकार के समय दिसंबर 2018 में राज्य के 24 जिलों में क्राइम ब्रांच और स्पेशल इंटेलिजेंस सेल (SIU) को भंग कर दिया गया था। क्राइम ब्रांच में भ्रष्टाचार, वसूली और रंगदारी की शिकायतों के बाद यह कार्रवाई की गई थी। उस निर्णय के पीछे भी यही तर्क सामने आया था कि इकाई की कार्यप्रणाली में सुधार की जरूरत है।

अब एक बार फिर से ऐसे ही आरोप सामने आने के बाद क्राइम ब्रांच की साख पर प्रश्नचिह्न लग गया है। आम जनता के बीच यह चर्चा है कि अगर समय रहते इन आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो पुलिस की विश्वसनीयता पर गहरा असर पड़ सकता है।

फिलहाल देखना यह होगा कि इन गंभीर आरोपों के बीच क्राइम ब्रांच खुद को कितनी जल्दी और किस तरह से पारदर्शी साबित कर पाती है, और क्या वास्तव में सभी के लिए कानून एक समान लागू होता है या नहीं।

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