दुर्ग निगम में कानून दो तरह का! कमजोर पर कार्रवाई, अफसर सुरक्षित,,मुख्यमंत्री के सुशाशन में जवाबदेही गायब

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार प्रदेश में सुशासन का दावा कर रही है, लेकिन दुर्ग नगर निगम की जमीनी हकीकत इन दावों को आईना दिखा रही है। यहां नियम और कार्रवाई एक समान नहीं, बल्कि पद और पहुंच के हिसाब से तय होते नजर आ रहे हैं। कमजोर कर्मचारियों पर फौरन कार्रवाई होती है, जबकि गंभीर आरोपों से घिरे अधिकारी सुरक्षित दिखाई दे रहे हैं

हाल ही में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में निगम ने दो कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दीं और एक चपरासी ग्रेड कर्मचारी महीनों से निलंबन झेल रहा है। आरोप है कि नियुक्ति प्रक्रिया में अनियमितता हुई। कार्रवाई को सुशासन की मिसाल बताया जा रहा है, लेकिन यही प्रक्रिया जब बड़े अधिकारियों तक पहुंचती है तो फाइलें ठंडी पड़ जाती हैं।

करीब डेढ़ साल पहले निगम कर्मचारी अशोक करिहार की आत्महत्या ने पूरे निगम को झकझोर दिया था। चर्चा थी कि मृतक ने सुसाइड नोट में मानसिक प्रताड़ना का उल्लेख किया था और उसमें उपायुक्त मोहेंद्र साहू का नाम सामने आया था। यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही बल्कि मानवीय संवेदनशीलता से भी जुड़ा था, लेकिन मुख्यमंत्री की सरकार व शिक्षा मंत्री में न तो विभागीय जांच शुरू हुई और न ही किसी अधिकारी से जवाबदेही तय की गई।

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि आत्महत्या के महज 10 दिन के भीतर मृतक के पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति दे दी गई। बताया जाता है कि यह नियुक्ति बिना विधिवत मृत्यु प्रमाण पत्र के की गई, जबकि निगम में पहले से पात्र आवेदकों की वरीयता सूची मौजूद थी और कई लोग वर्षों से इंतजार कर रहे थे। उस समय स्थापना शाखा के प्रभारी स्वयं उपायुक्त मोहेंद्र साहू थे। आरोप है कि नियमों और वरीयता सूची को नजरअंदाज कर तात्कालिक नियुक्ति कराई गई।

निगम के भीतर यह मामला लंबे समय तक चर्चा में रहा, लेकिन न तो फाइलें आगे बढ़ीं और न ही किसी स्तर पर जांच की पहल हुई। अब स्थिति यह है कि निगम में 6–7 साल पुराने मामलों को निकालकर नोटिस जारी किए जा रहे हैं, प्लेसमेंट कर्मचारी और चपरासी ग्रेड पर त्वरित कार्रवाई की जा रही है, लेकिन आत्महत्या, सुसाइड नोट, नोटशीट में कथित हेरफेर और वरीयता सूची उल्लंघन जैसे गंभीर मामलों पर प्रशासनिक चुप्पी बनी हुई है।

यह सवाल अब सीधे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार व शिक्षा मंत्री पर उठ रहा है कि क्या दुर्ग नगर निगम में अफसरशाही सरकार से ऊपर हो गई है। क्या सुशासन का मतलब सिर्फ निचले कर्मचारियों पर कार्रवाई है, जबकि ताकतवर अधिकारी नियमों से ऊपर बने रहेंगे? दुर्ग वही क्षेत्र है जहां सत्ता और संगठन के बड़े चेहरे सक्रिय हैं, इसके बावजूद निगम में जवाबदेही का अभाव साफ नजर आ रहा है।

अब निगाहें मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री पर टिकी हैं। क्या दुर्ग निगम में चल रहे इस चयनित शासन की निष्पक्ष जांच होगी, या फिर सुशासन का दावा फाइलों और पोस्टरों तक ही सीमित रह जाएगा। क्योंकि अगर दुर्ग जैसे बड़े निगम में यह हाल है, तो प्रदेश के बाकी निकायों की तस्वीर क्या होगी—यह सवाल अब हर कर्मचारी और आम नागरिक पूछ रहा है।

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